एक ग़ज़ल
किस्मत में क्या लिखा है, ये बतला रहा हूँ मैं।
हाथों में जाम लेके भी प्यासा रहा हूँ मैं।
सच बोलने की ऐसी है आदत पड़ी हुई,
अपने किये की आप, सज़ा पा रहा हूँ मैं।
सोचा नहीं था हमने कि होगा ये एक रोज़,
काँधे पे अपनी लाश, लिये जा रहा हूँ मैं।
अश्कों से तर न होती कभी उसकी आस्तीं,
क्यूँ ज़ख़्म अपने दोस्त को दिखला रहा हूँ मैं।
डूबी नहीं है कश्ती, भँवर में कभी मेरी,
लहरों के इज़तिराब से तंग आ रहा हूँ मैं।
मिन्नत करूंगा गै़र से ये सोचना न तुम,
ख़ुद्दार ‘दिल’ है, सबको ये समझा रहा हूँ मैं।
-दिलशेर दिल
किस्मत में क्या लिखा है, ये बतला रहा हूँ मैं।
हाथों में जाम लेके भी प्यासा रहा हूँ मैं।
सच बोलने की ऐसी है आदत पड़ी हुई,
अपने किये की आप, सज़ा पा रहा हूँ मैं।
सोचा नहीं था हमने कि होगा ये एक रोज़,
काँधे पे अपनी लाश, लिये जा रहा हूँ मैं।
अश्कों से तर न होती कभी उसकी आस्तीं,
क्यूँ ज़ख़्म अपने दोस्त को दिखला रहा हूँ मैं।
डूबी नहीं है कश्ती, भँवर में कभी मेरी,
लहरों के इज़तिराब से तंग आ रहा हूँ मैं।
मिन्नत करूंगा गै़र से ये सोचना न तुम,
ख़ुद्दार ‘दिल’ है, सबको ये समझा रहा हूँ मैं।
-दिलशेर दिल
No comments:
Post a Comment