Tuesday, October 23, 2018

ग़ज़ल 
इश्क पे कभी दिल से, ऐतबार मत करना।
प्यार है महज धोका, प्यार व्यार मत करना।

देखने में हो चाहे, वो तो चाँद जैसा भी।
भूल के भी उससे तुम, आँखें चार मत करना।

आंसुओं से भीगा हो, चाहे उसका वो दामन।
उस हसीन कातिल का, ऐतबार मत करना।

उनसे हमने पूछा तो, हँस के वो ये कहते हैं।
रात गई बात गई, अब इंतजार मत करना।

भूल तुम से हो जाए, प्यार करने की ऐ ‘‘दिल‘‘
एक बार कर लो तो, बार बार मत करना।

_दिलशेर "दिल"

एक  ग़ज़ल
दिल की इस झील में तूफान उठाते जाओ.
‘‘जाते-जाते कोई इलजाम लगाते जाओ‘‘

जिस ने हलचल सी मचाई थी कभी इस दिल में,
वो कहानी मुझे इक बार सुनाते जाओ.

मेरे हँसने की वजह मुझ से न पूछे कोई,
तुम भी मेरी तरह गम अपने छिपाते जाओ.

तुम कोई खत मुझे इस बार जो लिखने बैठो,
उसमे अरमानो को लफ्जों में सजाते जाओ.

ए मेरे ‘‘दिल‘‘ ये बता इतना परेशां क्यूँ है?
गम भुला कर जियो और हँसते-हँसाते जाओ
-दिलशेर "दिल"
एक ग़ज़ल
किस्मत में क्या लिखा है, ये बतला रहा हूँ मैं।
हाथों में जाम लेके भी प्यासा रहा हूँ मैं।

सच बोलने की ऐसी है आदत पड़ी हुई,
अपने किये की आप, सज़ा पा रहा हूँ मैं।

सोचा नहीं था हमने कि होगा ये एक रोज़,
काँधे पे अपनी लाश, लिये जा रहा हूँ मैं।

अश्कों से तर न होती कभी उसकी आस्तीं,
क्यूँ ज़ख़्म अपने दोस्त को दिखला रहा हूँ मैं।

डूबी नहीं है कश्ती, भँवर में कभी मेरी,
लहरों के इज़तिराब से तंग आ रहा हूँ मैं।

मिन्नत करूंगा गै़र से ये सोचना न तुम,
ख़ुद्दार ‘दिल’ है, सबको ये समझा रहा हूँ मैं।
-दिलशेर दिल
ग़ज़ल 
क्या मिलेगा तुमको बोलो नफरत-ओ-तकरार से।
जीत लो दुनिया को यारो अम्न से और प्यार से।

रात भर मैं सो न पाया, करवटें लेता रहा।
इतना डर जाता हूँ मैं तो सुब्हा के अखबार से।

गम दिए, आंसू दिए, ठुकरा के इक दिन चल दिया।
कब तलक दिल को बचाएं, दोस्तों के वार से।

सबने समझाया मुझे पर, मैने न मानी बात इक,
मैं न वाकिफ था ग़ज़ल से, गीत से, अशआर से।

ये यकीं मेरा भी इक दिन, सच में बदल जायेगा,
लोग पाते हैं यहाँ सब कुछ भले किरदार से।
- दिलशेर "दिल"