24-11-2019
एक ताज़ा ग़ज़ल
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सिर्फ इतनी सी इनायत करना।
कभी हम से भी मुहब्बत करना।
मुझ से बढ़कर नहीं दुश्मन होगा,
नहीं उल्फत की ख़िलाफ़त करना।
मेरा दुश्मन भी मेरा हो जाए,
उससे मेरी भी हिमायत करना।
जान दे दी है वतन की खातिर,
आगे तुम इसकी हिफाज़त करना।
-दिलशेर "दिल"
एक ताज़ा ग़ज़ल
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सिर्फ इतनी सी इनायत करना।
कभी हम से भी मुहब्बत करना।
मुझ से बढ़कर नहीं दुश्मन होगा,
नहीं उल्फत की ख़िलाफ़त करना।
मेरा दुश्मन भी मेरा हो जाए,
उससे मेरी भी हिमायत करना।
जान दे दी है वतन की खातिर,
आगे तुम इसकी हिफाज़त करना।
-दिलशेर "दिल"